भतीजी से रेप के आरोपी की आजीवन कारावास की सजा 10 साल में बदली गई

 हाईकोर्ट ने कहा- नाबालिगाता साबित करने स्वीकार्य सबूत रिकार्ड में उपलब्ध नहीं है


बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालब ने अपनी भतीजी के साथ जबरन यौन संबंध बनाने के आरोपी एक व्यक्ति के खिलाफ दोषसिद्धि के आदेश को इस आधार पर बदल दिया है कि उसकी नाबालिगता साबित करने के लिए कोई ठोस या कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है। भतीजी ने अपने चाचा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। न्यायमूर्ति रजनी दुबे और न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की खंडपीठ ने पोक्सो अधिनियम के तहत दोषसिद्धि को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2) (एफ) में संशोधित भी किया। ने आजीवन कारावास की सजा को 10 साल के कोर्ट ने कारावास की में बदलने का आदेश भी दिया।
कोर्ट ने आदेश देते हुए कहा कि यह स्पष्ट है कि पीड़िता की उम्र के संबंध में अभियोजन पक्ष के साक्ष्य के

संबंध में, अभियोजन पक्ष द्वारा इस तथ्य को साबित करने के लिए कोई ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत नहीं पेश किया गया है कि पीड़िता घटना की तारीख पर नाबालिग थी। इसके बावजूद कि ट्रायल कोर्ट ने उसे फैसले में नाबालिग माना है। इसलिए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए इस निष्कर्ष को खारिज कर दिया कि घटना की तारीख पर पीड़िता की उम्र 16 6 या या 18 साल से कम थी।

कोई दस्तावेज पेश नहीं हो सके

15 दिसंबर 2018 को उसके चाचा ने यौन याचिका के मुताबिक 15 वि संबंध बनाया। पुलिस ने आरोपी चाचा को गिरफ्तार कर लिया। ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 376 (3) (16 वर्ष से कम उम्र की महिला के साथ बलात्कार) के तहत दोषी पाया और उसे जुर्माने सहित आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई। कोर्ट में पीड़िता की जन्मतिथि के समर्थन में स्कूल का प्रवेश रजिस्टर पेश किया गया था। इस तरह के कोई दस्तावेज पेश नहीं हो सके जिससे की स्पष्ट हो सके कि घटना की तारीख पर पीड़िता की उम्र 16 या 18 वर्ष से कम थी। हाईकोर्ट ने इसके बाद आईपीसी की धारा 376(2) (एफ) के तहत मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी को 10 वर्ष के लिए सश्रम कारावास की सजा सुनाई है।

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