बाला एस. आर. V/S B.C. Patil और अन्य 1948 SC 5181

 बाला एस. आर. V/S B.C. Patil और अन्य 1948 SC 5181




बाला एस. आर.                                        अपीलार्थी
                                      बनाम

बी.सी. पाटिल एवं अन्य                            उतरार्थीगण

                

संदर्भ (Reference) A.I.R 1948, S.C. 518.

विषय (Subject)- यह मामला मजदूरी भुगतान अधिनियिम की धारा 2 (6) तथा धारा 15 पर आधारित है।

वाद के तथ्य (facts fof the case)- (1) मिल-मालिक तथा कर्मचारियों के मध्य 1948 ई. में बोनस के विषय में एक विवाद उत्पन्न हुआ, जिसे औद्योगिक न्यायालय बम्बई को निस्तारण हेतु सौंप दिया गया।

(2) औद्योगिक न्यायालय ने 23 अप्रैल, 1949 ई. को अपना पंचाट पारित किया जिसके अनुसार 4½ मास की मजदूरी कुछ शर्तों के साथ बोनस के रूप में दी जानी थी। इन शर्तों में पत्र नं. 6 मुख्य थी। इस शर्त के अनुसार वह व्यक्ति जो बोनस पाने का अधिकारी है, किन्तु मिल की नौकरी में नही है, उसको नवम्बर 1949 ई. तक का बोनस इकट्टा दिया जाता था और इस प्रकार के मामलों में बोनस की माँग मिल के मैनेजर को लिखित में निश्चित तिथि तक देनी थी।

(3) उन व्यक्तियों को जिन्होंने निश्चित दिनांक तक बोनस की माँग के प्रार्थना-पत्र दे दिये थे, उनको बोनस का भुगतान कर दिया गया, किन्तु उतरार्थी न. 3 जिसने प्रार्थना-पत्र निश्चित दिनांक कुछ समय बाद दिया था, को बोनस का भुगतान करने से मना कर दिया गया क्योंकि उसने पंचाट की शर्तों का पालन नहीं किया था। इस प्रकार की माँग उतरार्थीगण न. 2,4 तथा 6 ने भी की थी।

औद्योगिक न्यायालय (Industrial Court) औद्योगिक न्यायालय ने उन सब को दो-दो मास के वेतन के बराबर धनराशि बोनस के रूप में देने का आदेश पारित कर दिया।

अपीलीय न्यायाधिकरण (Appellate Court)- अपीलार्थी ने औद्योगिक न्यायालय के आदेश के विरूद्ध अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष अपील प्रस्तुत की जो औद्योगिक न्यायालय के पंचाट को सही मानते हुए, अस्वीकार कर दी गई।

उच्च न्यायालय (High Court)- तब अपीलार्थी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत समादेष की रिट याचिका अपीलीय न्यायाधिकरण के निर्णय के विरूद्ध उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की, लेकिन वह भी अस्वीकार कर दी गई।

उच्च न्यायालय के निर्णय के विरूद्ध उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ के समक्ष अपील प्रस्तुत की गई, और वह भी अस्वीकार कर दी गई।

उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) तब अपीलार्थी ने, विशेष अनुमति प्राप्त
करने के पश्चात् उच्च न्यायालय के निर्णय के विरूद्ध उच्च्चतम न्यायालय में अपील प्रस्तुत की।

उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचारण न्यायालय हेतु मुख्य प्रश्न था कि " क्या प्रथम अपीलार्थी (मजदूरी भुगतान अधिनियिम के अन्तर्गत अधिकारी) को इन दावों को मजदूरी भुगतान अधिनियम के अन्तर्गत अधिकारी की हैसियत से ग्रहण करने का अधिकार था।"

इस प्रश्न का उतर इस पर आधारित है कि "क्या इस मामले में प्रदान किया गया बोनस मजदूरी भुगतान अधिनियम की धारा 2 (6) के अन्तर्गत मजदूरी है?"

मजदूरी से तात्पर्य समस्त प्रकार के पारिश्रमिक से है। पारिश्रमिक भुगतान का रूप है तथा भुगतान परिश्रम का प्रतिकर है।

अतः यह नहीं कहा जा सकता कि प्रत्येक मामले में बोनस पारिश्रमिक है, क्योंकि पारिश्रमिक परिश्रम को प्रतिकर है, जबकि कुछ मामले ऐसे भी हो सकते हैं, जिनसे बोनस तो प्रदान किया जात है, किन्तु उनसे कोई परिश्रम नहीं लिया जाता है। जैसे अंशधारी को बोनस प्रदान किया जाना।

अपीलार्थी को ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि चूँकि बोनस मजदूरी नहीं हैं। अतः औद्योगिक न्यायालय को बोनस सम्बन्धी विवादों के निस्तारण करने का क्षेत्राधिकार प्राप्त नहीं है।

औद्योगिक न्यायालय को बोनस प्रदान करने से पहले यह भी देखना चाहिए कि "क्या नौकरी की समस्त शर्तों का परिपालन हो गया है?" और यदि किसी मामले में किसी शर्त का पालन नहीं हुआ है तो न्यायालय को उस मामले में बोनस प्रदान नहीं करना चाहिए। उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों द्वारा विचार किया गया कि बोनस तभी प्रदान किया जाना चाहिए जबकि नौकरी की समस्त शर्तों का पूर्ण रूप से परिपालन हो गया हो। इस मामले में बोनस का भुगतान करने के सम्बन्ध में कोई स्पष्ट संविदा नहीं थी। अतः बोनस का प्रदान किया जाना न्यायालय के ऊपर निर्भर था।

माननीय न्यायाधीशों ने यह विचार भी प्रकट किया कि बोनस मजदूरी नहीं है, अतः औद्योगिक न्यायालय को बोनस प्रदाने करने का कोई क्षेत्राधिकार नहीं है।

निर्णय (Judgement)- अतः उच्चतम न्यायालय द्वारा अपील स्वीकार की गई तथा औद्योगिक न्यायालय की डिक्री अपास्त कर दी गई।

अपील स्वीकार की गई।

प्रतिपादित विधि के सिद्धान्त (Principles of law lain down)- 1. जहाँ कि बोनस औद्योगिक न्यायालय के पंचाट के अनुसार भुगतान किया जाता है, वहाँ बोनस मजदूरी की परिभाषा में नहीं आता है।

2. यदि बोनस मजदूरी नहीं है, तो औद्योगिक न्यायालय को बोनस प्रदान करने का क्षेत्राधिकार नहीं है।

Post a Comment

Previous Post Next Post