छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 (Chhattisgarh Land Revenue Code, 1959)

 

छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 (Chhattisgarh Land Revenue Code, 1959) मूलतः "मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959" है, जिसे छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ में भी लागू किया गया। यह संहिता भूमि, भूमि स्वामित्व, भूमि रिकॉर्ड, राजस्व वसूली और उससे जुड़े सभी मामलों को नियंत्रित करती है।

 

📘 छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 – मुख्य बिंदु (संक्षेप में)

🔷 उद्देश्य:

  • राज्य की जमीन का रिकॉर्ड रखना।

  • किसानों/जमीन मालिकों के हक और दायित्व तय करना।

  • भूमि की बिक्री, किराया, हकदारी, उत्तराधिकार आदि को स्पष्ट करना।

  • भूमि विवादों का समाधान और न्यायिक प्रक्रिया तय करना।


🧾 मुख्य धाराएँ (Sections) – सरल भाषा में

धारा संख्याविषय
धारा 57सम्पूर्ण भूमि का मालिक राज्य होगा।
धारा 115भू-स्वामी का अधिकार (Rights of Bhumiswami)
धारा 131भू-स्वामी के विरुद्ध कार्यवाही (भूमि के उल्लंघन पर)
धारा 146भूमि से जबरन कब्जा हटाने की कार्यवाही
धारा 170(B)आदिवासी की जमीन गैर-आदिवासी के नाम पर नहीं हो सकती (ट्रांसफर पर रोक)
धारा 250अवैध कब्जाधारियों को हटाना
धारा 251सरकारी भूमि का अतिक्रमण हटाना
धारा 257सरकारी भूमि पर कब्जा करने पर जुर्माना
धारा 258कृषि भूमि को गैर-कृषि प्रयोजन में परिवर्तित करना
धारा 266सीमांकन विवाद एवं समाधान

⚖️ विशेष बातें:

  • भूमि का रिकॉर्ड (Record of Rights): प्रत्येक भूमि का रिकॉर्ड रखा जाता है जैसे खसरा, खतौनी, पथवारी आदि।

  • भू-स्वामी की परिभाषा: वो व्यक्ति जिसे सरकारी रिकॉर्ड में भूमि का मालिक माना गया हो।

  • पट्टेदार, कब्जाधारी, कृषक आदि की अलग-अलग श्रेणियाँ परिभाषित की गई हैं।


📌 आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा:

धारा 170(b) बहुत महत्वपूर्ण है – इसके अनुसार कोई भी गैर-आदिवासी व्यक्ति, आदिवासी की जमीन नहीं खरीद सकता। अगर ऐसा होता है तो जमीन फिर से आदिवासी को लौटाई जा सकती है।


⚠️ अतिक्रमण / कब्जा (Encroachment):

सरकारी भूमि या किसी अन्य की भूमि पर अवैध कब्जा करना अपराध है। तहसीलदार या राजस्व अधिकारी ऐसे कब्जे को हटाने का अधिकार रखते हैं।


🏛️ न्यायिक व्यवस्था:

राजस्व मामलों में 4 स्तर के अधिकारी होते हैं:

  1. पटवारी

  2. तहसीलदार / नायब तहसीलदार

  3. अनुविभागीय अधिकारी (S.D.O.)

  4. कलेक्टर / अपर कलेक्टर

इनके आदेशों के विरुद्ध अपील की व्यवस्था है।


राजस्व अधिकारी कौन होता है? उसकी शक्तियाँ, कार्य और नियुक्ति – आसान भाषा में उदाहरण सहित समझाइए।


1. राजस्व अधिकारी कौन होता है?

राजस्व अधिकारी वो सरकारी कर्मचारी होता है जो भूमि से जुड़े मामलों जैसे कि भूमि रिकॉर्ड, राजस्व वसूली, सीमांकन, भूमि विवाद, अतिक्रमण हटाना आदि का कार्य करता है। ये अधिकारी सीधे राजस्व विभाग (Revenue Department) के अधीन काम करता है।

राजस्व अधिकारी कई स्तरों पर होते हैं – जैसे:

  • पटवारी

  • तहसीलदार

  • नायब तहसीलदार

  • अनुविभागीय अधिकारी (SDO / SDM)

  • कलेक्टर / जिला मजिस्ट्रेट


🔍 2. राजस्व अधिकारियों के प्रकार और उदाहरण

स्तरअधिकारीउदाहरणकार्य
सबसे निचलापटवारीगाँव का पटवारीखेतों का रिकॉर्ड रखना, नक्शा बनाना
मध्य स्तरतहसीलदारतहसील का प्रमुख अधिकारीनामांतरण, बंटवारा, विवाद समाधान
उच्च स्तरSDO / SDMउपखंड अधिकारीराजस्व अपील सुनना, बड़ी कार्यवाही
सबसे उच्चकलेक्टरजिले का राजस्व प्रमुखपूरे जिले की भूमि और राजस्व व्यवस्था का संचालन

💼 3. राजस्व अधिकारी के मुख्य कार्य (कार्यभार):

🔹 (A) भूमि से संबंधित कार्य:

  • खेतों का सीमांकन करना

  • जमीन के मालिकाना हक का रिकॉर्ड रखना

  • नामांतरण (mutation) करना

  • नक्शा एवं खसरा सुधारना

  • विवाद सुलझाना (भूमि विवाद)

🔹 (B) राजस्व वसूली:

  • भूमि कर (Lagaan), जुर्माना वसूलना

  • बकाया वसूली

🔹 (C) अतिक्रमण हटाना:

  • सरकारी जमीन से अवैध कब्जा हटाना

  • बिना अनुमति निर्माण रोकना

🔹 (D) प्राकृतिक आपदा में कार्य:

  • सूखा, बाढ़ आदि में नुकसान का सर्वे करना

  • मुआवज़ा वितरण करवाना


⚖️ 4. शक्तियाँ (Powers):

  • अदालती शक्ति (Quasi-Judicial Power): तहसीलदार और ऊपर के अधिकारी कोर्ट जैसे आदेश दे सकते हैं।

  • राजस्व रिकॉर्ड बदलने का अधिकार (जैसे नामांतरण, खारिज दाखिल)

  • अतिक्रमण हटाने की शक्ति (धारा 250, 251 के अंतर्गत)

  • भू-संपत्ति विवाद में आदेश देना


🧑‍⚖️ 5. राजस्व अधिकारी की नियुक्ति कैसे होती है?

पदकैसे नियुक्त होता है?
पटवारीराज्य सरकार की परीक्षा (जैसे CG Vyapam परीक्षा)
नायब तहसीलदार / तहसीलदारलोक सेवा आयोग (CGPSC)
SDO / SDMराज्य प्रशासनिक सेवा (RAS/CGPSC) से
कलेक्टरIAS अधिकारी के रूप में UPSC से

🧠 6. उदाहरण से समझिए:

उदाहरण 1:

रामलाल के खेत की सीमाएँ उसके पड़ोसी के खेत से मिलती हैं। दोनों में विवाद है कि कौन-सी जमीन किसकी है।
⇒ तहसीलदार या SDO सीमांकन करवा सकता है और निर्णय देगा।

उदाहरण 2:

श्यामलाल ने सरकारी ज़मीन पर झोपड़ी बना ली।
⇒ तहसीलदार उसे नोटिस देकर कब्जा हटा सकता है (धारा 250 के तहत)।

उदाहरण 3:

किसी किसान की मौत के बाद उसकी ज़मीन का नाम उसके बेटे के नाम करना है।
⇒ पटवारी और तहसीलदार मिलकर नामांतरण की प्रक्रिया करते हैं।


📚 निष्कर्ष:

राजस्व अधिकारी का कार्य बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि:

  • वो भूमि विवाद सुलझाता है

  • राजस्व वसूली करता है

  • जनता और सरकार के बीच सेतु का कार्य करता है


नगास्तर क्षेत्र (Scheduled Area) क्या है?

नगास्तर क्षेत्र वे इलाके होते हैं जिन्हें संविधान की पाँचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) के अंतर्गत विशेष संरक्षण दिया गया है। ये क्षेत्र आमतौर पर आदिवासी बाहुल्य होते हैं और यहाँ के लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए विशेष कानून और नियम लागू होते हैं।

उदाहरण: छत्तीसगढ़ के बस्तर, कांकेर, दंतेवाड़ा, जशपुर जैसे आदिवासी जिले।


📘 राजस्व बंदोबस्त आयुक्त (Commissioner of Settlement and Land Records)

राजस्व बंदोबस्त आयुक्त एक वरिष्ठ अधिकारी होता है, जो भूमि का सर्वेक्षण, रिकॉर्ड दुरुस्तीकरण, सीमांकन और भूमि के वर्गीकरण जैसे बंदोबस्त कार्यों को देखता है।


📜 नगास्तर क्षेत्र में राजस्व बंदोबस्त आयुक्त की नियुक्ति – कैसे होती है?

  1. राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है।

  2. यह अधिकारी आमतौर पर राज्य प्रशासनिक सेवा या भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) का वरिष्ठ अधिकारी होता है।

  3. विशेष रूप से नगास्तर क्षेत्रों में नियुक्ति करते समय यह देखा जाता है कि:

    • अधिकारी को आदिवासी क्षेत्र की संवेदनशीलता की समझ हो।

    • वह संविधान की 5वीं अनुसूची और PESA Act (1996) के नियमों का पालन करे।

    • भूमि संबंधी मामलों में आदिवासी हितों की रक्षा करे।


⚖️ भूमिका (Role) – नगास्तर क्षेत्र में:

कार्यविवरण
भूमि सर्वेक्षणआदिवासी क्षेत्रों की भूमि का पुनः सीमांकन और रिकॉर्ड बनाना
बंदोबस्त प्रक्रियाआदिवासी भूमि को सुरक्षित दर्ज करना ताकि कोई बाहर का व्यक्ति कब्जा न कर सके
ग्राम सभा की सहमतिPESA कानून के तहत ग्राम सभा की सहमति से ही भूमि से संबंधित कार्य होना चाहिए
आदिवासियों की जमीन की सुरक्षाधारा 170(b) जैसे कानूनों के पालन की निगरानी

📌 विशेष बात:

नगास्तर क्षेत्रों में राजस्व बंदोबस्त अधिकारी को काम करते समय ग्राम सभा की अनुमति और आदिवासी अधिकारों का विशेष ध्यान रखना होता है। यहाँ सामान्य क्षेत्रों की तुलना में ज़्यादा संवेदनशीलता और नियमों की आवश्यकता होती है।


🧠 उदाहरण:

मान लीजिए, बस्तर जिले के किसी गाँव में भूमि का नया बंदोबस्त (survey and settlement) करना है। यहाँ राजस्व बंदोबस्त आयुक्त को:

  • ग्राम सभा से अनुमति लेनी होगी,

  • पुराने नक्शों और खसरों को ध्यान से जांचना होगा,

  • किसी भी बाहरी व्यक्ति को गैर-कानूनी रूप से जमीन न मिले, इसका ध्यान रखना होगा।


📚 निष्कर्ष:

नगास्तर क्षेत्रों में राजस्व बंदोबस्त आयुक्त की नियुक्ति एक संवेदनशील और जिम्मेदार कार्य है, जिसका मुख्य उद्देश्य है:

  • आदिवासी भूमि की रक्षा करना

  • ग्राम सभाओं की सहभागिता से भूमि रिकॉर्ड तैयार करना

  • सुरक्षित और पारदर्शी बंदोबस्त प्रक्रिया लागू करना


1. पटवारी कौन होता है?

पटवारी एक ग्राम स्तर का राजस्व अधिकारी होता है जो गांव या कुछ गांवों के समूह का भूमि रिकॉर्ड (खेतों का हिसाब-किताब) संभालता है।
यह राजस्व विभाग के सबसे निचले स्तर का अधिकारी होता है लेकिन उसका कार्य किसानों और ज़मीन मालिकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है।


📜 2. पटवारी की नियुक्ति कैसे होती है?

विवरणजानकारी
नियुक्ति करने वालाराज्य सरकार / राजस्व विभाग
चयन प्रक्रियालिखित परीक्षा (जैसे CG Vyapam परीक्षा) + दस्तावेज़ सत्यापन
योग्यता12वीं पास + कंप्यूटर डिप्लोमा (जैसे DCA)
प्रशिक्षण (Training)चयन के बाद पटवारी प्रशिक्षण केंद्र में कुछ महीनों की ट्रेनिंग

छत्तीसगढ़ में पटवारी की भर्ती छत्तीसगढ़ व्यावसायिक परीक्षा मंडल (CG Vyapam) के द्वारा की जाती है।


💼 3. पटवारी के मुख्य कार्य (काम):

कार्यविवरण
📖 खेतों का रिकॉर्ड रखनाहर खेत का खसरा नंबर, रकबा (क्षेत्रफल), फसल आदि दर्ज करना
🧾 बी-1, खसरा, खतौनी जारी करनाकिसानों को उनके भूमि रिकॉर्ड देना
✍️ नामांतरण (mutation)ज़मीन बिकने या वारिस के आधार पर मालिक का नाम बदलना
📐 सीमांकन (Boundary marking)खेतों की सीमाएं बताना और विवाद में सीमांकन करना
💰 फसल बीमा / राजस्व कर में सहायताफसल नुकसान पर रिपोर्ट बनाना
📌 फसल गिरदावरी करनाहर सीजन में यह बताना कि किस खेत में कौन-सी फसल बोई गई
⚠️ अवैध कब्जा रिपोर्ट करनाकिसी ज़मीन पर अतिक्रमण की जानकारी देना
🚨 आपदा रिपोर्टिंगसूखा, बाढ़, ओलावृष्टि आदि की स्थिति में रिपोर्ट बनाना
सरकारी योजनाओं में सहायताकिसान सम्मान निधि, ऋण माफी आदि योजनाओं के लिए डेटा देना

⚖️ 4. पटवारी की शक्तियाँ (Powers):

शक्तिविवरण
✅ भूमि का रिकॉर्ड अपडेट करने की शक्ति
✅ सीमांकन में सहयोग करने की शक्ति
✅ खेतों की जानकारी के आधार पर रिपोर्ट देने की शक्ति
✅ राजस्व निरीक्षक और तहसीलदार के निर्देशों का पालन और रिपोर्ट देने की जिम्मेदारी

⚠️ ध्यान दें: पटवारी के पास न्यायिक या निर्णय देने की शक्ति नहीं होती। वह सिर्फ रिकॉर्ड तैयार करता है और रिपोर्ट देता है, अंतिम निर्णय तहसीलदार या उससे ऊपर के अधिकारी लेते हैं।


🧠 उदाहरण से समझें:

📌 उदाहरण 1:

रामलाल की ज़मीन का नाम अब उसके बेटे श्यामलाल के नाम करना है।
⇒ पटवारी आवेदन लेकर, ज़मीन का निरीक्षण कर, नामांतरण की रिपोर्ट तैयार करता है।

📌 उदाहरण 2:

दो किसानों में खेत की सीमा को लेकर विवाद है।
⇒ पटवारी खेत में जाकर सीमांकन करता है और रिपोर्ट तहसीलदार को देता है।

📌 उदाहरण 3:

गाँव में ओलावृष्टि से फसल खराब हो गई।
⇒ पटवारी मौके पर जाकर गिरदावरी करता है और नुकसान की रिपोर्ट बनाता है ताकि किसान को मुआवज़ा मिल सके।


📚 निष्कर्ष:

पटवारी किसानों और ज़मीन मालिकों के लिए सबसे नज़दीकी और जरूरी राजस्व अधिकारी होता है। उसके बिना:

  • नामांतरण नहीं हो सकता

  • खेती का रिकॉर्ड नहीं बनता

  • बीमा या राहत नहीं मिलती

इसलिए पटवारी की भूमिका छोटी दिखती है लेकिन बहुत महत्वपूर्ण होती है।


1. राजस्व अधिकारी कौन होता है?

राजस्व अधिकारी वह सरकारी अधिकारी होता है जो भूमि, भूमि रिकॉर्ड, नामांतरण, अतिक्रमण हटाना, राजस्व वसूली और भूमि विवादों से संबंधित मामलों को देखता है।

यह पद पटवारी से लेकर कलेक्टर तक कई स्तरों पर होता है, लेकिन जब हम "राजस्व अधिकारी" कहें तो आमतौर पर तहसीलदार, नायब तहसीलदार या SDO (अनुविभागीय अधिकारी) को समझा जाता है।


📜 2. राजस्व अधिकारी की नियुक्ति कैसे होती है?

पदकैसे नियुक्त होता है?नियुक्ति करने वाला
नायब तहसीलदारराज्य लोक सेवा आयोग (जैसे CGPSC) द्वाराराज्य सरकार
तहसीलदारप्रमोशन या सीधे चयन सेराज्य सरकार
राजस्व निरीक्षक (RI)सीधी भर्ती / प्रमोशनजिला प्रशासन
SDO / SDMराज्य प्रशासनिक सेवा या IASराज्य सरकार / UPSC

💼 3. राजस्व अधिकारी के मुख्य कार्य:

श्रेणीकार्य
📖 भूमि रिकॉर्ड से संबंधितनामांतरण, सीमांकन की अनुमति, रिकॉर्ड सुधार
⚖️ भूमि विवाद का समाधानभू-स्वामी विवाद, कब्जे की शिकायतों का निपटारा
🏗️ अतिक्रमण हटानासरकारी या निजी भूमि पर अवैध कब्जा हटाना (धारा 250, 251)
💰 राजस्व वसूलीभूमि कर, जुर्माना और अन्य राजस्व वसूलना
📌 आपदा प्रबंधनसूखा, बाढ़, फसल नुकसान में रिपोर्ट बनाना और राहत बाँटना
🧾 ग्राम सभा और पंचायतों को रिपोर्टिंगविशेषकर PESA क्षेत्रों में

⚖️ 4. शक्तियाँ (सक्तियाँ / Powers):

शक्तिविवरण
अधिकारपूर्ण आदेश देने की शक्ति (Quasi-Judicial Powers)
✅ नामांतरण, खारिज दाखिल, सीमांकन जैसे मामलों में निर्णय देने की शक्ति
✅ अतिक्रमण हटाने के लिए बल प्रयोग करने की अनुमति
✅ भू-अभिलेख को प्रमाणित करने की वैधानिक शक्ति
✅ अधीनस्थ अधिकारियों (पटवारी, RI) को आदेश देने की शक्ति

🧠 5. उदाहरण से समझें:

📌 उदाहरण 1:

श्यामलाल की ज़मीन पर रामलाल ने कब्जा कर लिया है।
⇒ तहसीलदार दोनों पक्षों की सुनवाई करके कब्जा हटाने का आदेश दे सकता है।

📌 उदाहरण 2:

गाँव में किसी ने सरकारी ज़मीन पर झोपड़ी बना ली।
⇒ राजस्व अधिकारी (तहसीलदार) धारा 250/251 के अंतर्गत अतिक्रमण हटाने का आदेश देगा।

📌 उदाहरण 3:

किसान ने नामांतरण के लिए आवेदन किया, पटवारी ने रिपोर्ट दी।
⇒ तहसीलदार रिकॉर्ड चेक कर नामांतरण को स्वीकृति देगा।


📚 निष्कर्ष:

राजस्व अधिकारी की भूमिका गाँव से लेकर जिला स्तर तक भूमि संबंधी मामलों को नियमबद्ध, न्यायपूर्ण और पारदर्शी रूप से संभालने की होती है।

  • नियुक्ति राज्य सरकार करती है

  • कार्यों में जमीन, विवाद, राजस्व, राहत आदि आते हैं

  • शक्तियों में आदेश देने और कार्रवाई करवाने का अधिकार होता है


प्रश्न का उत्तर दो भागों में:

1. भू-राजस्व (लगान) बकाया की वसूली किन-किन तरीकों से की जाती है?

जब भू-स्वामी (जमीन का मालिक) समय पर भूमि का राजस्व / लगान / कर नहीं देता है, तो राजस्व अधिकारी बकाया की वसूली के लिए विभिन्न उपाय करता है।

📌 वसूली के प्रकार:

वसूली विधिविवरण
नोटिस जारी करनापहले भू-स्वामी को बकाया का नोटिस दिया जाता है (जैसे धारा 146 के अंतर्गत)
जुर्माना लगानासमय पर भुगतान न करने पर जुर्माना जोड़ा जाता है
चल संपत्ति की कुर्कीट्रैक्टर, पशु, कृषि उपकरण आदि कुर्क किए जा सकते हैं
अचल संपत्ति की कुर्कीज़मीन का एक हिस्सा कुर्क किया जा सकता है (कुछ अपवाद छोड़कर)
राजस्व वसूली प्रमाण पत्रतहसीलदार Recovery Certificate जारी करता है
नीलामी (Auction)कुर्क की गई संपत्ति की नीलामी कर राजस्व वसूला जाता है

यह प्रक्रिया राजस्व वसूली की प्रक्रिया संहिता (Revenue Recovery Code) के अंतर्गत होती है।


2. भू-स्वामी की किन संपत्तियों को कुर्की से मुक्त रखा गया है?

कुछ संपत्तियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें कुर्क नहीं किया जा सकता, चाहे भू-स्वामी पर कितना भी लगान बकाया क्यों न हो।

⚖️ छूट प्राप्त (Exempted) संपत्तियाँ:

संपत्तिकारण
रहने का मकान (Primary Residence)यदि भू-स्वामी और उसके परिवार का एकमात्र निवास है
आवश्यक वस्तुएँदैनिक उपयोग की वस्तुएँ जैसे बर्तन, बिस्तर, पहनने के कपड़े
खेती के लिए जरूरी पशु और औजारजैसे हल, बैल, ट्रैक्टर (यदि एक ही हो)
2 हेक्टर तक कृषि भूमि (कुछ मामलों में)जब किसान लघु/सीमांत श्रेणी का हो
अन्न, अनाज, खाद्य भंडारजो परिवार की जीविका के लिए जरूरी हो
धार्मिक वस्तुएँ / पूजन सामग्रीकानूनी रूप से सुरक्षित

यह छूट CPC (सिविल प्रक्रिया संहिता) की धारा 60 तथा राज्य राजस्व संहिता में उल्लिखित होती है।


📚 निष्कर्ष (Summary):

🔹 राजस्व बकाया वसूली के तरीके:

  • नोटिस → कुर्की → नीलामी
    🔹 कुर्की से छूट:

  • रहन-सहन की जरूरी चीजें

  • खेती के जरूरी औजार

  • एकमात्र मकान

  • कुछ धार्मिक एवं जीविका संबंधी वस्तुएं


🧠 उदाहरण से समझें:

रामलाल किसान है, उसका ₹5000 लगान बकाया है। सरकार ने नोटिस भेजा, लेकिन भुगतान नहीं किया। तहसीलदार ने ट्रैक्टर कुर्क करने का आदेश दिया, लेकिन पाया गया कि वही उसका एकमात्र ट्रैक्टर है और वह लघु किसान है।
👉 ऐसे में ट्रैक्टर को कुर्क नहीं किया जा सकता


भांग की सूचना से क्या अभिप्राय है?

"भांग की सूचना" (in Revenue Terminology) का अर्थ है:

जब कोई व्यक्ति या संस्था यह बताती है कि उसने किसी ज़मीन पर कब्जा छोड़ दिया है (भूमि खाली कर दी है) या भूमि अब उसके उपयोग में नहीं है, तो इसे "भांग की सूचना" कहा जाता है।

🔹 इसे अंग्रेज़ी में कहा जाता है: "Notice of Relinquishment"
🔹 "भांग" का अर्थ होता है: त्याग देना
🔹 यह विशेष रूप से तब उपयोग में आता है जब किसान या भू-स्वामी स्वेच्छा से जमीन को सरकार को वापस करना चाहता है


📜 भांग की सूचना से संबंधित विधि / कानून:

छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 (या अन्य राज्यों की Land Revenue Code) में इससे संबंधित प्रावधान होते हैं।

अक्सर यह प्रावधान धारा 66 से 69 (या समकक्ष) के अंतर्गत आता है:

📌 मुख्य प्रावधान:

बिंदुविवरण
📅 अवधिभांग की सूचना एक वर्ष पहले लिखित रूप में तहसीलदार या पटवारी को देनी होती है
📝 रूपयह सूचना लिखित में देनी होती है, ताकि भूमि रिकॉर्ड में संशोधन किया जा सके
स्वीकार / अस्वीकारराजस्व अधिकारी यह देखेगा कि भांग करना उचित है या नहीं (उदाहरण: कहीं सरकारी योजना तो नहीं चल रही)
🧾 नाम हटानाभांग स्वीकार होने पर भूमि रिकॉर्ड (खसरा/बी-1) से उस व्यक्ति का नाम हटा दिया जाता है
⚠️ उत्तरदायित्वसूचना देने के बाद भी जब तक सरकार उस ज़मीन पर नया प्रबंध न कर ले, तब तक पुराना भू-स्वामी ज़िम्मेदार होता है

🔍 भांग की सूचना कब दी जाती है?

स्थितिकारण
किसान खेती छोड़ना चाहता हैफसल घाटा, पारिवारिक कारण
मालिक अब भूमि नहीं संभाल सकताउम्र, स्वास्थ्य, अन्य नौकरी
कोई भूमि को सरकार को सौंपना चाहता हैमुआवज़े के बदले, योजना के लिए

🧠 उदाहरण:

श्यामलाल ने 2 एकड़ ज़मीन खेती के लिए पट्टे पर ली थी। लेकिन अब वह उसे वापस करना चाहता है।
👉 वह तहसीलदार को एक साल पहले भांग की सूचना देगा कि वह अब उस भूमि का उपयोग नहीं करेगा।
👉 तहसीलदार रिकॉर्ड से उसका नाम हटवाकर जमीन को किसी अन्य पात्र को दे सकता है।


⚖️ नियमों का उद्देश्य क्या है?

  1. ज़मीन बंजर न हो जाए

  2. रिकॉर्ड अपडेट रहे

  3. अवैध कब्जों से बचाव हो

  4. नई पात्रता सूची बन सके


📚 निष्कर्ष:

🔹 "भांग की सूचना" का मतलब होता है कि कोई व्यक्ति अपनी भूमि या भूमि का अधिकार स्वेच्छा से छोड़ने की सूचना देता है
🔹 यह प्रक्रिया राजस्व विभाग में लिखित रूप से एक वर्ष पहले दी जाती है।
🔹 इस सूचना से भू-अभिलेख में बदलाव होता है और भूमि को पुनः आवंटन की प्रक्रिया शुरू होती है।


1. पट्टा क्या होता है?

पट्टा का मतलब है —

"सरकार द्वारा किसी व्यक्ति को भूमि उपयोग के लिए लिखित अनुमति देना।"
यह एक अधिकार पत्र (Lease Document) होता है, जिसके अनुसार व्यक्ति उस भूमि पर निश्चित अवधि तक कब्जा व उपयोग कर सकता है।

🔹 यह अधिकार स्थायी नहीं होता
🔹 ज़मीन का मालिकाना हक (Ownership) सरकार के पास रहता है
🔹 लाभार्थी को सिर्फ उपयोग का अधिकार होता है


📜 2. पट्टा से संबंधित विधियाँ (Laws Related to Patta):

पट्टे की प्रक्रिया और वैधता राज्य की भूमि राजस्व संहिता और भूमि आवंटन नियमों के अंतर्गत निर्धारित होती है।

छत्तीसगढ़ में लागू कानून:

  1. छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959

  2. छत्तीसगढ़ नगर भूमि (पट्टा) नियम

  3. PESA कानून (आदिवासी क्षेत्रों में पट्टा ग्राम सभा की अनुमति से)

  4. वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) – वन भूमि पर पट्टा


📌 पट्टे के प्रकार (Important Types of Patta):

पट्टा का नामअर्थ / उद्देश्य
पाविवर्म पट्टा (Paivivaram Patta)ग्रामीण या नगरीय क्षेत्रों में अवैध कब्जाधारी को नियमित करने के लिए दिया जाने वाला पट्टा
कृषि पट्टाखेती के लिए दी जाने वाली सरकारी जमीन
आवासीय पट्टारहने के मकसद से दी गई जमीन (मुख्यमंत्री आबादी पट्टा योजना आदि)
वन अधिकार पट्टा (FRA Patta)आदिवासियों और वनाश्रितों को दी गई वन भूमि का पट्टा

🔍 3. पाविवर्म पट्टा क्या होता है?

"पाविवर्म पट्टा" (Paivivaram Patta) विशेष रूप से उस भूमि पर दिया जाता है जिस पर व्यक्ति लंबे समय से कब्जा किए हुए होता है, लेकिन उसका कब्जा अब तक अवैध या अनधिकृत होता है।

राज्य सरकार जब तय करती है कि ऐसे कब्जों को नियमित किया जाए, तब वह पाविवर्म पट्टा जारी करती है।

📌 उदाहरण:

  • किसी व्यक्ति ने वर्षों पहले सरकार की ज़मीन पर मकान बना लिया।

  • अब सरकार तय करती है कि ऐसे कब्जे वालों को पट्टा देकर नियमित कर दिया जाए
    👉 ऐसे में उन्हें "पाविवर्म पट्टा" दिया जाता है।


⚖️ 4. पाविवर्म पट्टा से संबंधित विधिक प्रक्रिया:

चरणविवरण
📝 आवेदनव्यक्ति को आवेदन करना होता है – पंचायत, नगर निगम या तहसील में
📍 भू-स्थिति जाँचपटवारी, RI आदि निरीक्षण करते हैं कि कब्जा कब से है, कितना है
ग्राम सभा/स्थानीय निकाय की अनुशंसाविशेषकर अनुसूचित क्षेत्रों में
📄 पट्टा जारीतहसीलदार या नगर पालिका द्वारा पाविवर्म पट्टा जारी किया जाता है

⚠️ शर्तें (Conditions):

  • ज़मीन गैर-विवादित होनी चाहिए

  • कब्जा एक निश्चित तिथि से पहले का होना चाहिए (जैसे 1 जनवरी 2008)

  • सार्वजनिक भूमि, जल स्रोतों, सड़क, स्कूल आदि पर नहीं होना चाहिए

  • एक परिवार को एक ही पट्टा मिल सकता है


📚 निष्कर्ष (Summary):

विषयजानकारी
पट्टासरकारी भूमि पर उपयोग का लिखित अधिकार (मालिकाना हक नहीं)
पाविवर्म पट्टालंबे समय से कब्जा कर रहे लोगों को सरकार द्वारा नियमित रूप से दिया गया पट्टा
कानूनछत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, FRA, नगर भूमि नियम, PESA आदि
प्रक्रियाआवेदन → जांच → स्वीकृति → पट्टा जारी

प्रश्न 1: वे कौन-से दस्तावेज हैं जिनका रजिस्ट्रीकरण (पंजीयन) वैकल्पिक (Optional) है?

(Registration of Documents is Optional – Under Indian Registration Act, 1908)

भारतीय पंजीयन अधिनियम, 1908 की धारा 18 (Section 18) में बताया गया है कि कुछ दस्तावेजों का रजिस्ट्रीकरण अनिवार्य (जरूरी) नहीं है, यानी कि वे वैकल्पिक (Optional) हैं।

📄 वैकल्पिक रजिस्ट्रीकरण वाले दस्तावेज:

दस्तावेजविवरण
इच्छापत्र (Will)मृत्युपरांत संपत्ति के बंटवारे की घोषणा – रजिस्ट्री आवश्यक नहीं
छोटे अवधि के पट्टे (Lease)1 साल से कम की लीज (लीज डीड)
गिफ्ट डीड – अन्य संपत्तियों कीअगर धार्मिक या सामाजिक संस्था को गिफ्ट किया गया है
समझौता पत्र (Agreement)यदि उसमें स्वामित्व हक का परिवर्तन नहीं होता
Power of Attorneyअगर संपत्ति हस्तांतरण न हो, तब रजिस्ट्री आवश्यक नहीं
मौखिक समझौते का लेखा-जोखाजो सिर्फ प्रमाण हेतु लिखा गया हो, स्वामित्व नहीं देता
अनुबंध, प्रतिज्ञा पत्र, घोषणापत्रअगर वे संपत्ति के अधिकार को प्रभावित नहीं करते

📌 ध्यान दें: इनका रजिस्ट्रीकरण अनिवार्य नहीं है, लेकिन रजिस्ट्री करा लेने पर दस्तावेज़ अधिक वैधानिक और मजबूत बन जाते हैं।


प्रश्न 2: रजिस्ट्रीकरण अधिकारी किन आधारों पर किसी दस्तावेज़ का पंजीकरण (रजिस्ट्री) करने से इनकार कर सकता है?

रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1908 की धारा 71 और 22-A के अनुसार, रजिस्ट्रार या सब-रजिस्ट्रार कुछ स्थितियों में दस्तावेज़ की रजिस्ट्री करने से मना कर सकते हैं।

📌 रजिस्ट्री से इनकार करने के आधार:

आधारविवरण
दस्तावेज अधूरी जानकारी वाला होजैसे – गवाह न हों, पक्षकार उपस्थित न हो
दस्तावेज़ गैर-कानूनी होजैसे – फर्जी, धोखाधड़ी या विवादित भूमि पर आधारित
बैन की गई जमीन का होसरकारी भूमि, कब्जा शुदा, आदिवासी की भूमि (170(b)) आदि
PESA / 5वीं अनुसूची क्षेत्र की भूमिग्रामसभा की अनुमति के बिना अगर आदिवासी भूमि बेची गई हो
स्टाम्प ड्यूटी अधूरी होसही स्टाम्प पेपर पर न बना हो या शुल्क कम हो
भूमि विवादित हो / कोर्ट केस में होजैसे कि भूमि पर स्थगन आदेश (Stay) लगा हो
जमीन बेचने वाला असली मालिक न होया उसकी कानूनी हैसियत प्रमाणित न हो
अवयस्क या असमर्थ व्यक्ति द्वारा किया गया दस्तावेजजैसे नाबालिग द्वारा अनुबंध

📌 ऐसे मामलों में रजिस्ट्रार "कारण सहित अस्वीकृति आदेश (Refusal Order)" देगा।


🧾 निष्कर्ष (Summary):

प्रश्नउत्तर
कौन से दस्तावेज वैकल्पिक हैं?इच्छापत्र, 1 साल से कम की लीज, पावर ऑफ अटॉर्नी (बिना ट्रांसफर), घोषणापत्र, समझौता आदि
कब रजिस्ट्री मना की जा सकती है?जब दस्तावेज फर्जी, अधूरा, विवादित भूमि पर आधारित, बिना स्टाम्प, या कानून के विरुद्ध हो

विलेखों का रजिस्ट्रीकरण क्या होता है?

विलेखों (जैसे – बिक्री विलेख, गिफ्ट डीड, पट्टा, लीज, ऋण अनुबंध आदि) का रजिस्ट्रीकरण का अर्थ है:

ऐसे दस्तावेजों को सरकारी रजिस्ट्रार के कार्यालय में दर्ज कराना, ताकि वे कानूनी रूप से मान्य और प्रमाणित हो जाएं।


🎯 विलेखों के रजिस्ट्रीकरण का उद्देश्य (Objectives of Registration):

उद्देश्यविवरण
कानूनी मान्यता देनादस्तावेज को वैधानिक और प्रमाणिक बनाना
स्वामित्व का सार्वजनिक रिकॉर्ड बनानाजिससे कोई भी देख सके कि ज़मीन किसकी है
भविष्य के विवादों को रोकनासंपत्ति विवाद में दस्तावेज कानूनी सबूत बनता है
धोखाधड़ी से बचावएक ही संपत्ति की दो बार बिक्री को रोका जा सकता है
सरकारी राजस्व संग्रहस्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्री शुल्क से सरकार को आय
संपत्ति का ट्रैक रिकॉर्ड बनानाहर हस्तांतरण की श्रृंखला दर्ज होती है

🏆 विलेखों के रजिस्ट्रीकरण के लाभ (Benefits):

लाभविवरण
🛡️ कानूनी सुरक्षा मिलती हैसंपत्ति या अनुबंध को लेकर कोर्ट में प्रमाण बनता है
📄 दस्तावेज की प्रामाणिकता सिद्ध होती हैरजिस्ट्री दस्तावेज गवाह की तरह काम करता है
🔍 सार्वजनिक सूचना उपलब्ध होती हैकोई भी व्यक्ति जमीन का रिकार्ड ऑनलाइन / ऑफिस में देख सकता है
⚖️ न्यायिक प्रक्रिया में मान्यताबिना रजिस्ट्री दस्तावेज़ पर कोर्ट अमूमन भरोसा नहीं करता
🔏 फ्रॉड और डुप्लीकेसी से सुरक्षाएक ही संपत्ति की बार-बार बिक्री को रोका जा सकता है
🏛️ कर्ज / लोन के लिए सहायकबैंक रजिस्टर्ड दस्तावेज पर ही लोन देते हैं
💰 विवादों से बचकर समय और पैसा बचता है

📚 उदाहरण से समझें:

  1. रजिस्ट्री हुई बिक्री विलेख:
    रमेश ने मोहन को ज़मीन बेची और रजिस्ट्री कराई। अब कोई तीसरा व्यक्ति उस ज़मीन पर दावा नहीं कर सकता, क्योंकि रजिस्ट्री सार्वजनिक रिकॉर्ड है।

  2. गैर-रजिस्ट्री दस्तावेज का नुकसान:
    अगर बिना रजिस्ट्री के मोहन को ज़मीन बेची जाती है, और बाद में विक्रेता किसी और को ज़मीन बेच दे, तो कोर्ट में मोहन का दावा कमजोर हो जाएगा।


📝 निष्कर्ष (Summary):

बिंदुविवरण
रजिस्ट्रीकरण का उद्देश्यवैधता, पारदर्शिता, विवाद से बचाव और रिकॉर्ड सुरक्षित करना
रजिस्ट्री के लाभकानूनी सुरक्षा, सार्वजनिक जानकारी, कोर्ट में मान्यता, धोखाधड़ी से बचाव



रजिस्ट्रीकरण (Registration) क्या है?

रजिस्ट्रीकरण का मतलब है:

किसी दस्तावेज़ (जैसे ज़मीन की बिक्री, किराया, गिफ्ट, ऋण अनुबंध आदि) को कानूनी रूप से सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज कराना, ताकि वह दस्तावेज़ वैध, प्रमाणित और सबूत के रूप में मान्य हो जाए।

🔹 यह प्रक्रिया रजिस्ट्रार या सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में होती है।
🔹 इसका उद्देश्य होता है — दस्तावेज़ का रिकॉर्ड सरकार के पास सुरक्षित रखना और भविष्य के विवादों से बचाव करना।


⚖️ किस कानून के तहत रजिस्ट्री होती है?

भारतीय पंजीयन अधिनियम, 1908 (The Indian Registration Act, 1908)
👉 इस कानून में यह तय किया गया है कि कौन-से दस्तावेज़ों का रजिस्ट्रीकरण अनिवार्य है और कौन-से वैकल्पिक


📄 रजिस्ट्री किन दस्तावेजों की की जाती है?

दस्तावेजरजिस्ट्री क्यों जरूरी
✅ बिक्री विलेख (Sale Deed)स्वामित्व परिवर्तन
✅ गिफ्ट डीड (Gift Deed)दान में दी गई संपत्ति
✅ लीज डीड (Lease Deed)किराए पर दी गई जमीन (1 वर्ष से अधिक)
✅ पावर ऑफ अटॉर्नी (कुछ मामलों में)संपत्ति का नियंत्रण किसी और को देना
✅ ऋण अनुबंधबंधक या गिरवी रखना

🎯 रजिस्ट्रीकरण का उद्देश्य:

  1. दस्तावेज़ को कानूनी मान्यता देना

  2. सार्वजनिक रिकॉर्ड तैयार करना

  3. भविष्य के विवादों से बचाव

  4. संपत्ति से जुड़े धोखाधड़ी को रोकना

  5. सरकारी राजस्व की प्राप्ति (स्टाम्प ड्यूटी व रजिस्ट्री शुल्क)


🧠 उदाहरण से समझिए:

रमेश ने श्याम को एक ज़मीन बेची।
👉 अगर उन्होंने बिक्री विलेख की रजिस्ट्री करवाई, तो अब वह दस्तावेज़ कानूनी रूप से मान्य हो गया।
👉 श्याम अब मालिक बन गया और भविष्य में कोई भी दावा करेगा तो रजिस्ट्री रिकॉर्ड ही निर्णायक सबूत होगा।


📝 निष्कर्ष (Summary):

विषयविवरण
रजिस्ट्रीकरण क्या हैदस्तावेज को कानूनी तौर पर सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज कराना
कहाँ होता हैसब-रजिस्ट्रार कार्यालय में
किसलिए होता हैवैधता, प्रमाणिकता और विवाद से सुरक्षा के लिए
कानूनभारतीय पंजीयन अधिनियम, 1908

पट्टा का अर्थ:

पट्टा एक सरकारी दस्तावेज़ होता है, जिसके द्वारा किसी व्यक्ति या संस्था को सरकार भूमि उपयोग का अधिकार देती है, एक निश्चित समय अवधि के लिए।

सरल शब्दों में:
पट्टा = सरकारी ज़मीन को किसी व्यक्ति को उपयोग के लिए दिया गया अधिकार पत्र

🔹 मालिकाना हक (Ownership) नहीं होता
🔹 सिर्फ उपयोग करने का हक (Right to Use) होता है
🔹 सरकार कभी भी शर्तों के उल्लंघन पर पट्टा रद्द कर सकती है


🏛️ पट्टा किसके द्वारा दिया जाता है?

स्तरअधिकारी
गाँवग्राम पंचायत / पटवारी / तहसीलदार
शहरनगर निगम / नगर पंचायत
विशेष मामलेकलेक्टर / राज्य सरकार द्वारा

📜 पट्टा के प्रकार:

प्रकारउपयोग
आवासीय पट्टामकान बनाने के लिए ज़मीन
कृषि पट्टाखेती के लिए सरकारी ज़मीन
व्यवसायिक पट्टादुकान / व्यापार के लिए ज़मीन
पाविवर्म पट्टापहले से कब्जे में रह रहे लोगों को नियमित करने के लिए
वन अधिकार पट्टा (FRA)आदिवासियों को वन भूमि पर अधिकार

📌 पट्टा मिलने की शर्तें:

  • कब्जा कानूनी हो या सरकार की अनुमति से हो

  • ज़मीन विवादित न हो

  • उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए ही हो

  • समय पर शुल्क / लगान देना हो

  • बिना अनुमति के ज़मीन न बेचना


🧠 उदाहरण से समझिए:

रामू के पास कोई ज़मीन नहीं थी। वह पिछले 10 साल से सरकारी ज़मीन पर मकान बनाकर रह रहा था।
👉 सरकार ने उसकी स्थिति देखते हुए उसे "आवासीय पट्टा" दे दिया।
अब वह वैध रूप से उस ज़मीन पर रह सकता है, लेकिन उसे बेचना नहीं सकता जब तक उसे पूर्ण स्वामित्व न मिले।


⚖️ पट्टा का लाभ:

लाभविवरण
✅ सरकारी ज़मीन पर वैध कब्जा मिलता है
✅ सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सकता है
✅ मकान बनाने / लोन लेने में मदद
✅ ज़मीन से बेदखली नहीं हो सकती (जब तक शर्तों का पालन हो)

📚 निष्कर्ष (Summary):

विषयविवरण
पट्टासरकारी ज़मीन उपयोग करने का अधिकार-पत्र
स्वामित्वनहीं होता, सिर्फ उपयोग की अनुमति
प्रकारकृषि, आवासीय, पाविवर्म, FRA आदि
दस्तावेज़सरकारी विभाग द्वारा जारी, रजिस्ट्री नहीं बल्कि अनुबंध


📜 रजिस्ट्री कैसे होती है? – ज़मीन या संपत्ति की रजिस्ट्री की पूरी प्रक्रिया आसान भाषा में

जब कोई व्यक्ति ज़मीन, मकान या फ्लैट खरीदता है, तो उसे कानूनी रूप से अपने नाम दर्ज कराने के लिए "रजिस्ट्री" (पंजीयन / Registration) कराना होता है।
यह प्रक्रिया सरकारी दस्तावेज़ में संपत्ति के ट्रांसफर को दर्ज करने की होती है।


🛠️ रजिस्ट्री की प्रक्रिया (Step-by-step Process):

🔹 1. दस्तावेज तैयार करना (Drafting the Deed):

  • सबसे पहले वकील या दस्तावेज लेखक से बिक्री विलेख / गिफ्ट डीड / लीज डीड आदि तैयार करवाई जाती है।

  • दस्तावेज पर विक्रेता और खरीदार की जानकारी, ज़मीन का विवरण, कीमत, नक्शा आदि होता है।


🔹 2. स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन शुल्क जमा करना:

  • सरकार के अनुसार तय स्टांप ड्यूटी (%) और रजिस्ट्रेशन फीस जमा की जाती है।
    📍 उदाहरण: छत्तीसगढ़ में स्टांप ड्यूटी 5% और रजिस्ट्रेशन शुल्क 1% (मूल्य के अनुसार)

  • यह भुगतान ऑनलाइन या बैंक चालान के माध्यम से होता है।


🔹 3. ऑनलाइन स्लॉट बुक करना (Appointment):

  • अब ज़्यादातर राज्यों में ऑनलाइन पोर्टल पर जाकर रजिस्ट्रार ऑफिस में समय तय करना (slot booking) होता है।

  • जैसे – cgigr.gov.in (छत्तीसगढ़ के लिए)


🔹 4. रजिस्ट्री ऑफिस जाना (Sub-Registrar Office):

  • तय समय पर खरीदार, विक्रेता और दो गवाह दस्तावेजों के साथ रजिस्ट्रार ऑफिस जाते हैं।

  • वहां पर:

    • सभी के बायोमेट्रिक (फिंगरप्रिंट) और फोटो लिए जाते हैं

    • दस्तावेज़ की जांच और पुष्टि की जाती है


🔹 5. दस्तावेज की स्कैनिंग और पंजीयन (Registration):

  • रजिस्टर्ड दस्तावेज को स्कैन किया जाता है और एक रजिस्ट्री नंबर (Document Number) दिया जाता है।

  • इसके बाद एक पावती / प्रमाणपत्र (Registration Receipt) दी जाती है।


🔹 6. मूल दस्तावेज की वापसी:

  • कुछ ही दिनों में (या तुरंत) रजिस्ट्री के दस्तावेज पर रजिस्ट्रार की सील और हस्ताक्षर के साथ वापस दे दिया जाता है।


📄 रजिस्ट्री के लिए आवश्यक दस्तावेज़:

दस्तावेजअनिवार्यता
✅ विक्रेता और खरीदार का आधार कार्ड
✅ PAN कार्ड (₹50 लाख से ज़्यादा संपत्ति पर जरूरी)
✅ पासपोर्ट साइज फोटो (दोनों पक्षों की)
✅ ज़मीन के पुराने कागज़ (खसरा, बी-1, Khasra/Registry Copy)
✅ स्टांप शुल्क की रसीद
✅ दो गवाहों की पहचान प्रमाण

🧠 उदाहरण से समझिए:

श्याम ने ₹10 लाख की ज़मीन रामसे खरीदी।

  • उसने वकील से बिक्री विलेख बनवाया

  • 5% स्टांप ड्यूटी = ₹50,000 और रजिस्ट्रेशन शुल्क = ₹10,000 जमा किया

  • Slot बुक कर रजिस्ट्री ऑफिस गया

  • फिंगरप्रिंट और फोटो लिए गए

  • रजिस्ट्री नंबर मिला और 3 दिन बाद दस्तावेज़ वापस मिल गया

अब यह ज़मीन श्याम की कानूनी संपत्ति बन चुकी है।


📚 निष्कर्ष (Summary):

चरणविवरण
1️⃣ दस्तावेज तैयार करनाबिक्री विलेख / डीड बनाना
2️⃣ स्टांप ड्यूटी देनासरकारी टैक्स जमा करना
3️⃣ रजिस्ट्रार ऑफिस जानाफोटो, बायोमेट्रिक, दस्तावेज जांच
4️⃣ रजिस्ट्री नंबर मिलनारजिस्ट्रेशन कंप्लीट
5️⃣ दस्तावेज मिलनाअब ज़मीन कानूनी रूप से खरीदार की

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